जैन धर्म सतत त्यागी वैरागी मुनिराजों के बलिदान के बल पर संसार में प्रकाशमान रहा है । स्वयं की निजी साम्प्रदायिक स्वामित्व की शक्ति का एकता के लिए बलिदान कर श्रमण संघ जैसा सुविशाल संघ निर्माण करना सचमुच त्याग का अनुपम परिचय है ।
जब जब हम श्रमण संघ को देखते हैं तो हमारा हृदय श्रद्धेय गुरु परम्परा के उदारमना हृदय पर नतमस्तक हो जाता है । उन त्यागी मुनिराजों के नाम के आगे लगी उपमा उनके सच्चे जीवन को बताता है । आज का विषय है त्यागी मुनिराजों के उपमा को स्वयं के आगे लगाना कहा तक उचित है ?
श्रमण सूर्य ये उपमा मरुधर केसरी जी पर ही शोभायमान होती है । लोकमान्य सन्त ये रूपचंद जी महाराज पर ही सुशोभित होती है ।
अगर कोई मुनिराज अपने आप को ही अगर इन पदों के लिए योग्य सिद्ध करते हैं तो निःसन्देह उनके जीवन में कही ना कही उपाधियों की आकांक्षा उनके व्यवहार से नजर आ रही है ।
किसी को पद या उपाधि चाहिए तो सबसे पहले उन महापुरुषों जैसी योग्यता हासिल कर लेवें। पदों एवं उपाधियों के अंबार स्वतः लग जायेंगे । व्यर्थ ही किसी महापुरुष के त्याग व बलिदान से उपमित उपमा को आप अपने ही मन से स्वयं के लिए लगाकर कृपया महापुरुषों की आशातना के भागीदार मत बनें ।
भले ही दुनिया अंधभक्ति में माफ कर देगी पर कर्म तो किसी को माफ नहीं करता
वाणी गुरु की शब्द मेरे
गुरु अमृत शिष्य
डॉ वरुण मुनि
प्रवास स्थल – पुण्य भूमि पावन धाम जैतारण
प्रचारक – कीर जैन समाज
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